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अखाड़े

सिंहस्थ कुंभ मेले के 13 अखाड़े

कुंभ मेले में भाग लेने वाले साधुओं के संगठित समूहों को अखाड़ा कहते हैं। मूल अर्थ में अखाड़ा यानी कुश्ती और शस्त्रविद्या का अभ्यास करने का स्थान, पर साधु-संन्यासियों के संदर्भ में इसका अर्थ साधना, शिक्षा और धर्मरक्षा का केंद्र हो गया है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद द्वारा मान्यता प्राप्त तेरह अखाड़े कुंभ और सिंहस्थ के शाही (अब अमृत) स्नान में भाग लेते हैं। उनके स्नान का क्रम और समय अखाड़ा परिषद और प्रशासन मिलकर तय करते हैं।

इन तेरह अखाड़ों में से दस अखाड़े शैव हैं और वे दशनामी संन्यासियों की परंपरा के होकर भगवान शिव की और शिव से जुड़े देवताओं की उपासना करते हैं। तीन अखाड़े वैष्णव या बैरागी हैं और उनका संबंध विष्णु, विशेषकर श्रीराम और हनुमान, से है।

ध्वजा: सामान्य जानकारी

सिंहस्थ में अखाड़े की धर्मध्वजा ही उसकी पहचान, प्रतिष्ठा और अभिमान मानी जाती है। ध्वजा यानी धर्म का, अखाड़े के वर्चस्व का और इष्टदेव का प्रतीक। दी गई जानकारी के अनुसार तेरहों अखाड़े लगभग बावन हाथ ऊँचे, नीलगिरी की लकड़ी के खंभे पर अपनी ध्वजा फहराते हैं। तेरह अखाड़ों में से दस शैव और तीन वैष्णव हैं। शैव अखाड़ों की ध्वजाएँ मुख्य रूप से भगवा रंग की होती हैं, वैष्णवों में पाँच रंगों में से लाल, सफ़ेद और सुनहरा जैसे रंग दिखाई देते हैं, जबकि उदासीन अखाड़ों की ध्वजाओं में लाल, मोरपंखी और पीला/बसंती रंग मिलता है। उदासीन ध्वजाओं पर हनुमानजी और पंचदेव समर्पित होते हैं, ऐसा सामान्यतः माना जाता है।